राधानन्तापराधात् पततां वाधाम्बुधावनुद्धार: ।
वृन्दावनमपि मन्दायत इह करुणार्द्रदृक् प्रसारे ॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.100)
जो व्यक्ति श्रीराधा महारानी के प्रति अपराध करता है, वह उस अनंत अपराधों के कारण संसार की बाधाओं रूपी समुद्र में गिरकर उद्धार से वंचित रह जाता है। स्वयं श्रीवृन्दावन भी उस अपराधी पर करुणा नहीं करता, और अपनी कृपादृष्टि से उसे वंचित रखता है।
वृन्दावनमपि मन्दायत इह करुणार्द्रदृक् प्रसारे ॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.100)
जो व्यक्ति श्रीराधा महारानी के प्रति अपराध करता है, वह उस अनंत अपराधों के कारण संसार की बाधाओं रूपी समुद्र में गिरकर उद्धार से वंचित रह जाता है। स्वयं श्रीवृन्दावन भी उस अपराधी पर करुणा नहीं करता, और अपनी कृपादृष्टि से उसे वंचित रखता है।

