(राग - देश व सोरठ)
मैं तो तेरे दर्शन की हूँ भिखारी ।
अरजी सुनिये भान दुलारी ॥ टेक ॥ [1]
जीवन धन सर्वेश्वरी श्यामा, सब गुन आगर अति अभिरामा,
ध्यान धरूँ तुमको अठयामा, कीरत राज कुमारी ॥ [2]
नाम रटूँ नित तुमरो मुख से, जीवन बीते यासुं सुख से,
जगमें खोये बहुत दिन दुःख से, आई शरण तुम्हारी ॥ [3]
करुणानिधि जै जै श्रीराधा, शोभा सिन्धु रूप अगाधा,
हरो विरह की बेगहि बाधा, "रूपमाधरी" वारी ॥ [4]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)
मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। [1]
हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो। हे कीर्तिराज-कुमारी! मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मैं दिन-रात (आठों प्रहर) तुम्हारा ध्यान धरूँ। [2]
मैं सतत तुम्हारे नाम का स्मरण करती रहूँ, जिससे मेरी हर श्वास में केवल तुम्हारा ही नाम गूँजे। तभी मुझे सच्चा और परम आनंद मिलेगा।मैं संसार में बहुत दिनों तक दुःख में भटकती रही, अब तुम्हारी शरण में आई हूँ। [3]
हे करुणा की सागर, हे श्रीराधा! तुम्हारी जय हो। तुम सौंदर्य की महासागर हो, अगाध रूपवती हो। विरह की तीव्र पीड़ा को शीघ्र ही हर लो। “रूपमाधरी” तुम्हारे चरणों पर न्यौछावर है। [4]
मैं तो तेरे दर्शन की हूँ भिखारी ।
अरजी सुनिये भान दुलारी ॥ टेक ॥ [1]
जीवन धन सर्वेश्वरी श्यामा, सब गुन आगर अति अभिरामा,
ध्यान धरूँ तुमको अठयामा, कीरत राज कुमारी ॥ [2]
नाम रटूँ नित तुमरो मुख से, जीवन बीते यासुं सुख से,
जगमें खोये बहुत दिन दुःख से, आई शरण तुम्हारी ॥ [3]
करुणानिधि जै जै श्रीराधा, शोभा सिन्धु रूप अगाधा,
हरो विरह की बेगहि बाधा, "रूपमाधरी" वारी ॥ [4]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)
मैं तो तुम्हारे दर्शन की भिखारिन हूँ, हे भानु दुलारी श्री राधा! मेरी प्रार्थना सुन लीजिए। [1]
हे सर्वेश्वरी श्यामा! आप मेरा जीवन-धन हो, आप सब गुणों की खान और अति मनोहारिणी हो। हे कीर्तिराज-कुमारी! मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मैं दिन-रात (आठों प्रहर) तुम्हारा ध्यान धरूँ। [2]
मैं सतत तुम्हारे नाम का स्मरण करती रहूँ, जिससे मेरी हर श्वास में केवल तुम्हारा ही नाम गूँजे। तभी मुझे सच्चा और परम आनंद मिलेगा।मैं संसार में बहुत दिनों तक दुःख में भटकती रही, अब तुम्हारी शरण में आई हूँ। [3]
हे करुणा की सागर, हे श्रीराधा! तुम्हारी जय हो। तुम सौंदर्य की महासागर हो, अगाध रूपवती हो। विरह की तीव्र पीड़ा को शीघ्र ही हर लो। “रूपमाधरी” तुम्हारे चरणों पर न्यौछावर है। [4]

