वृन्दावन व्रज को महत कापे बरनी जाई - श्री सूरदास, सूर सागर, दशम सकंध

वृन्दावन व्रज को महत कापे बरनी जाई - श्री सूरदास, सूर सागर, दशम सकंध

वृन्दावन व्रज को महत्, कापे बरनी जाई ।
चतुरानन पग परसिकै, लोक गयो सुख पाई ॥

- श्री सूरदास, सूर सागर, दशम सकंध

श्रीधाम वृन्दावन और सम्पूर्ण व्रजभूमि का ऐसा अपार महत्व है कि उसका वर्णन वाणी और बुद्धि की सीमाओं से परे है। जब स्वयं चार मुख वाले ब्रह्मा जी ने ब्रज में अपने अपराध को स्वीकारते हुए श्रद्धा से श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श किया, तब वे अपने ब्रह्मलोक लौटकर अनन्त सुख को प्राप्त हुए।