नन्दलाल मो तन दुख हेरो - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (16)

नन्दलाल मो तन दुख हेरो - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (16)

(राग ईमन)
नन्दलाल मो तन दुख हेरो ।
श्री व्रज-रज पावन दरसाबहु, जासौं सहजें होय निवेरो ॥ [1]
उक-चूक सब क्षमो साँवरे, हा-हा, अब न करो अवसेरो ।
ललित लड़ैती देहु कृपा करि, श्रीवृन्दावन कुंज बसेरो ॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (16)

हे नन्दलाल, मेरे तन का दुःख देखो।  मुझे परम-पावन व्रज-रज का दर्शन करवाओ, जिससे मेरा संकट सहज ही टल जाए। [1]

हे साँवरे, मेरी समस्त भूल-चूक क्षमा कर दो—अब विलम्ब मत करो। श्री ललित लड़ैती विनय करते हैं कि कृपा कर मुझे श्रीवृन्दावन के कुंजों में बास दीजिए । [2]