(सवैया)
बैन वही उनको गुन गाइ, औ कान वही उन बैन सों सानी।
हाथ वही उन गात सरै, अरु पाइ वही जु वही अनुजानी॥ [1]
ज्ञान वही उन आन के संग, औ मान वही जु करै मनमानी।
त्यौं रसखानि वही रसखानि जु, है रसखानि सों है रसखानी॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
वही वाणी सार्थक है जो श्रीकृष्ण के गुणों का गान करे, और वही कान सार्थक हैं जो उनकी रस-वाणियों को सुनें। वही हाथ सार्थक हैं जो श्रीकृष्ण के अंगों की सेवा करें, और वही चरण धन्य हैं जो श्रीकृष्ण का सदा अनुसरण करें (उन्हीं के पीछे चलें)। [1]
वही ज्ञान सार्थक है जो श्रीकृष्ण एवं उनके प्रेमियों के अतिरिक्त किसी और के संग न लगे, और वही मान श्रेष्ठ है जो प्रेम-भरी मनमानी से भरा हो, जो श्रीकृष्ण को सदा द्रवित करता रहे। रसखान कहते हैं — वास्तव में वही ‘रसखान’ है, जो श्रीकृष्ण रूपी रसखान के रस का सच्चा रसिक हो और उस रस में सदा रस-मग्न रहता हो। [2]
बैन वही उनको गुन गाइ, औ कान वही उन बैन सों सानी।
हाथ वही उन गात सरै, अरु पाइ वही जु वही अनुजानी॥ [1]
ज्ञान वही उन आन के संग, औ मान वही जु करै मनमानी।
त्यौं रसखानि वही रसखानि जु, है रसखानि सों है रसखानी॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
वही वाणी सार्थक है जो श्रीकृष्ण के गुणों का गान करे, और वही कान सार्थक हैं जो उनकी रस-वाणियों को सुनें। वही हाथ सार्थक हैं जो श्रीकृष्ण के अंगों की सेवा करें, और वही चरण धन्य हैं जो श्रीकृष्ण का सदा अनुसरण करें (उन्हीं के पीछे चलें)। [1]
वही ज्ञान सार्थक है जो श्रीकृष्ण एवं उनके प्रेमियों के अतिरिक्त किसी और के संग न लगे, और वही मान श्रेष्ठ है जो प्रेम-भरी मनमानी से भरा हो, जो श्रीकृष्ण को सदा द्रवित करता रहे। रसखान कहते हैं — वास्तव में वही ‘रसखान’ है, जो श्रीकृष्ण रूपी रसखान के रस का सच्चा रसिक हो और उस रस में सदा रस-मग्न रहता हो। [2]

