आजु बधाई वृंदावन सुख-सिंधु हिलोर -  श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (62)

आजु बधाई वृंदावन सुख-सिंधु हिलोर - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (62)

आजु बधाई वृंदावन, सुख-सिंधु हिलोर ।
प्रियालाल तन-मन हुलसाने, मनसिज-मेघनि घोर ॥ [1]
सब सखि उमँगि-उमँगि गुन गावैं, नाचत मोर-चकोर ।
श्रीललितमोहिनी के उर बिहरत, नैंन-कमल चित-चोर ॥ [2]

- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (62)

आज इस दिव्य वृन्दावन में बधाई है, जहाँ सुख का सागर निरंतर तरंगायित हो रहा है। प्रिया-लाल अपने तन और मन से उल्लासित हो रहे हैं, और कामदेव-रूपी मेघ गंभीर स्वर में गर्जना कर रहे हैं। [1]

सखियाँ हर्षोल्लास से भरकर नित्य-विहार का गान करती रही हैं, मोर और चकोर नृत्यरत हैं। श्री ललित मोहिनी के हृदय में कमल-नयनों वाले चितचोर युगल-किशोर निरंतर विहार कर रहे हैं। [2]