कहूँ लकुट कहुँ मुरलिका, पीताम्बर सुधि नाहिं।
मोर-चंद्रिका झुकि रही, प्रिया ध्यान मन माहिं॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (63)
श्रीराधा के ध्यान में श्रीकृष्ण इस प्रकार डूबे हुए हैं कि उन्हें न तो अपनी छड़ी का होश है, न मुरली का पता है, और न ही अपने पीताम्बर की सुधि शेष है। यहाँ तक कि उनके सिर की मोर-पंखी चंद्रिका भी ध्यानमग्न होकर झुक गई है मानो वह भी उसी प्रेम-भाव में लीन हो गई हो।
मोर-चंद्रिका झुकि रही, प्रिया ध्यान मन माहिं॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (63)
श्रीराधा के ध्यान में श्रीकृष्ण इस प्रकार डूबे हुए हैं कि उन्हें न तो अपनी छड़ी का होश है, न मुरली का पता है, और न ही अपने पीताम्बर की सुधि शेष है। यहाँ तक कि उनके सिर की मोर-पंखी चंद्रिका भी ध्यानमग्न होकर झुक गई है मानो वह भी उसी प्रेम-भाव में लीन हो गई हो।

