(कवित्त)
जावक चरण देत चूम उर धर लेत,
रोमांचित भए हेत वहै ज्यौं बनारी हैं। [1]
चरणन मधिलाल प्रेम हिय को विशाल,
आदि है न अंत काल भरयौ भरैं भारी हैं॥ [2]
पद आंगुरी जे लाल एवै लाल की ही लाल,
ऐसे लाल पर बाल ललितादि वारी है। [3]
‘चतुर्भुजदास’ प्रभु भारसौं विरद पढ़ै,
नाचिकैं जा आगे सोई स्वामिनी हमारी है॥ [4]
- श्री हित चतुर्भुजदास
श्रीकृष्ण, श्रीराधा के चरणों में जावक लगाते हैं; उन कोमल चरणों को चूमकर हृदय से लगाते ही प्रेम-वेग से रोमांचित हो उठते हैं एवं नेह के आँसू बहाते हैं। [1]
उन श्रीचरणों के मध्य में लाल जी विराजमान हैं, जिनके हृदय में उन चरणों के लिए इतना प्रगाढ़ प्रेम है जिसका न आदि है और न ही अंत। [2]
श्रीराधा के चरणों की अँगुलियाँ इतनी लालिमा युक्त हैं मानो श्रीकृष्ण की लाली ही उनमें समाहित हो गई हो। उस अनुपम रंग पर ललिता आदि सखियाँ अपनी सुध-बुध खोकर अपने को वार देती हैं। [3]
श्रीचतुर्भुजदास कहते हैं — जिनके आगे हमारे प्रभु श्रीकृष्ण भी सिर झुकाते हैं, नृत्य करते हैं, वही हमारी परम आराध्या स्वामिनी श्रीराधिका हैं। [4]
जावक चरण देत चूम उर धर लेत,
रोमांचित भए हेत वहै ज्यौं बनारी हैं। [1]
चरणन मधिलाल प्रेम हिय को विशाल,
आदि है न अंत काल भरयौ भरैं भारी हैं॥ [2]
पद आंगुरी जे लाल एवै लाल की ही लाल,
ऐसे लाल पर बाल ललितादि वारी है। [3]
‘चतुर्भुजदास’ प्रभु भारसौं विरद पढ़ै,
नाचिकैं जा आगे सोई स्वामिनी हमारी है॥ [4]
- श्री हित चतुर्भुजदास
श्रीकृष्ण, श्रीराधा के चरणों में जावक लगाते हैं; उन कोमल चरणों को चूमकर हृदय से लगाते ही प्रेम-वेग से रोमांचित हो उठते हैं एवं नेह के आँसू बहाते हैं। [1]
उन श्रीचरणों के मध्य में लाल जी विराजमान हैं, जिनके हृदय में उन चरणों के लिए इतना प्रगाढ़ प्रेम है जिसका न आदि है और न ही अंत। [2]
श्रीराधा के चरणों की अँगुलियाँ इतनी लालिमा युक्त हैं मानो श्रीकृष्ण की लाली ही उनमें समाहित हो गई हो। उस अनुपम रंग पर ललिता आदि सखियाँ अपनी सुध-बुध खोकर अपने को वार देती हैं। [3]
श्रीचतुर्भुजदास कहते हैं — जिनके आगे हमारे प्रभु श्रीकृष्ण भी सिर झुकाते हैं, नृत्य करते हैं, वही हमारी परम आराध्या स्वामिनी श्रीराधिका हैं। [4]

