पशु पक्षी पाषाण हों, तृण अणु रज ब्रज गैल ।
कूप बावरी कीजिए, ललित किशोरी छैल ॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (91)
हे ललित किशोरी (श्रीराधा)! कृपा कर मुझे ब्रज की गलियों में कुछ भी बना दें— चाहे पशु, पक्षी, पत्थर, तृण या ब्रजरज का एक धूलिकण ही क्यों न हो। चाहे कोई कुआं, बावड़ी या निर्जीव वस्तु ही क्यों न बना दो, बस एक ही विनती है — ब्रजधाम की रज को छोड़ कहीं और जन्म या वास न देना।
कूप बावरी कीजिए, ललित किशोरी छैल ॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय श्रृंगार शतक (91)
हे ललित किशोरी (श्रीराधा)! कृपा कर मुझे ब्रज की गलियों में कुछ भी बना दें— चाहे पशु, पक्षी, पत्थर, तृण या ब्रजरज का एक धूलिकण ही क्यों न हो। चाहे कोई कुआं, बावड़ी या निर्जीव वस्तु ही क्यों न बना दो, बस एक ही विनती है — ब्रजधाम की रज को छोड़ कहीं और जन्म या वास न देना।

