अरे मन श्री वल्लभ गुन गाय ।
वृथा काल काहे को खोंवत, बेद पुराण पढ़ाय ॥ [1]
श्री गिरिराजधरण पेवै कों, नाहिन और उपाय ।
"रसिक" सदा अनन्य होय के, चित्त इत उत न डुलाय॥ [2]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
अरे मन! तू श्री वल्लभ (श्री वल्लभाचार्य / श्रीकृष्ण) के गुणों का प्रेमपूर्वक गान कर। तू वेद-पुराण पढ़ने में अपना समय व्यर्थ क्यों कर रहा है? [1]
गिरिराज जी को धारण करने वाले श्रीकृष्ण को प्राप्त करने का और कोई उपाय नहीं है। गोस्वामी श्री हरिराय जी कहते हैं कि रसिक सदा अनन्य भाव से, एकनिष्ठ होकर अपने प्रभु का भजन करता है; अपने चित्त को इधर-उधर नहीं डुलाता। [2]
वृथा काल काहे को खोंवत, बेद पुराण पढ़ाय ॥ [1]
श्री गिरिराजधरण पेवै कों, नाहिन और उपाय ।
"रसिक" सदा अनन्य होय के, चित्त इत उत न डुलाय॥ [2]
- गोस्वामी श्री हरिराय जी
अरे मन! तू श्री वल्लभ (श्री वल्लभाचार्य / श्रीकृष्ण) के गुणों का प्रेमपूर्वक गान कर। तू वेद-पुराण पढ़ने में अपना समय व्यर्थ क्यों कर रहा है? [1]
गिरिराज जी को धारण करने वाले श्रीकृष्ण को प्राप्त करने का और कोई उपाय नहीं है। गोस्वामी श्री हरिराय जी कहते हैं कि रसिक सदा अनन्य भाव से, एकनिष्ठ होकर अपने प्रभु का भजन करता है; अपने चित्त को इधर-उधर नहीं डुलाता। [2]

