ज्यों दिन जात अषाढ  के त्यों त्यों घटै मेरी भूख - ब्रज के दोहे

ज्यों दिन जात अषाढ के त्यों त्यों घटै मेरी भूख - ब्रज के दोहे

ज्यों दिन जात अषाढ  के, त्यों त्यों घटै मेरी भूख।
बिधिना कब दर्साइहौ, बरसाने के रूख ॥

- ब्रज के दोहे

जैसे जैसे आषाढ़ मास के दिन बीतते जा रहे हैं, त्यों-त्यों मेरी भूख कम होती जा रही है। हे विधाता! तू मुझे बरसाना धाम के वृक्षों के दर्शन कब कराएगा?