(सवैया)
अँखियाँ दुखिया नित ही तरसें, तुम आनसे नेह लगाते रहो ।
बिसराते रहो मोहि जान अयोग, वियोगकी ज्वाल जलाते रहो ॥ [1]
यहु न्याव कहाँका गोपाल भला, कल पाके मुझे कलपाते रहो ।
विनती है विनीत 'रशीद' यही, ब्रजमें घनश्याम बुलाते रहो ॥ [2]
- श्री रशीद जी
मेरी दुखियारी आँखें नित्य तुम्हारे दर्शन को तरसती हैं, और तुम कहीं और प्रेम लुटाते रहते हो। तुम मुझे अयोग्य जानकर बिसराते रहो, और वियोग की आग में मुझे जलाते रहते हो। [1]
हे प्यारे गोपाल! यह कहाँ का न्याय है, तुम चैन पाकर मुझे तड़पाते रहते हो? श्री रशीद जी विनम्र भाव से यही प्रार्थना करते हैं — हे घनश्याम! कृपा करके मुझे बस ब्रज में बुलाते रहो। [2]
अँखियाँ दुखिया नित ही तरसें, तुम आनसे नेह लगाते रहो ।
बिसराते रहो मोहि जान अयोग, वियोगकी ज्वाल जलाते रहो ॥ [1]
यहु न्याव कहाँका गोपाल भला, कल पाके मुझे कलपाते रहो ।
विनती है विनीत 'रशीद' यही, ब्रजमें घनश्याम बुलाते रहो ॥ [2]
- श्री रशीद जी
मेरी दुखियारी आँखें नित्य तुम्हारे दर्शन को तरसती हैं, और तुम कहीं और प्रेम लुटाते रहते हो। तुम मुझे अयोग्य जानकर बिसराते रहो, और वियोग की आग में मुझे जलाते रहते हो। [1]
हे प्यारे गोपाल! यह कहाँ का न्याय है, तुम चैन पाकर मुझे तड़पाते रहते हो? श्री रशीद जी विनम्र भाव से यही प्रार्थना करते हैं — हे घनश्याम! कृपा करके मुझे बस ब्रज में बुलाते रहो। [2]

