(राग झंझौटी-ताल चर्चरी)
सुनिये नाथ गरीब निवाज। आई सरन तुम्हें सब लाज ॥ [1]
अधम-उधारन बिरद-सम्हारन, त्रिभुवन के सिरताज ।
कुंजद्वार हौं खड़ी कबैकी, त्राहि त्राहि महराज ॥ [2]
करुनाकर अब बोलि लीजिये, करिये बिलम न आज ।
जुगलप्रियाको अभय कीजिये, यह नहिं कछु बड़ काज ॥ [3]
- श्री युगल प्रिया
हे नाथ, दीनों के पालनहार! मैं आपकी शरण में आ गई हूँ — अब मेरी लाज आपके ही हाथ है। [1]
आप तो अधमों का उद्धार करने वाले, और त्रिभुवन के स्वामी हैं एवं अपने इस विरद (ख्याति) के लिए प्रसिद्ध हैं! मैं बहुत समय से आपके निकुंज-द्वार पर खड़ी हूँ, बार-बार पुकार रही हूँ — त्राहि त्राहि! [2]
हे करुणा-सागर! अब मुझ पर कृपा कीजिए, आज विलम्ब न कीजिए। श्री युगल प्रिया जी कहती हैं कि इस दासी को अभयता प्रदान कीजिए —यह आपके लिए कोई बड़ा काम नहीं है । [3]
सुनिये नाथ गरीब निवाज। आई सरन तुम्हें सब लाज ॥ [1]
अधम-उधारन बिरद-सम्हारन, त्रिभुवन के सिरताज ।
कुंजद्वार हौं खड़ी कबैकी, त्राहि त्राहि महराज ॥ [2]
करुनाकर अब बोलि लीजिये, करिये बिलम न आज ।
जुगलप्रियाको अभय कीजिये, यह नहिं कछु बड़ काज ॥ [3]
- श्री युगल प्रिया
हे नाथ, दीनों के पालनहार! मैं आपकी शरण में आ गई हूँ — अब मेरी लाज आपके ही हाथ है। [1]
आप तो अधमों का उद्धार करने वाले, और त्रिभुवन के स्वामी हैं एवं अपने इस विरद (ख्याति) के लिए प्रसिद्ध हैं! मैं बहुत समय से आपके निकुंज-द्वार पर खड़ी हूँ, बार-बार पुकार रही हूँ — त्राहि त्राहि! [2]
हे करुणा-सागर! अब मुझ पर कृपा कीजिए, आज विलम्ब न कीजिए। श्री युगल प्रिया जी कहती हैं कि इस दासी को अभयता प्रदान कीजिए —यह आपके लिए कोई बड़ा काम नहीं है । [3]

