वृन्दारण्यलतागृहेषु वसतां गोविन्दलीलासुधा-
मापीयाश्रु विमुञ्चतां सुमधुरं राधेति संगायताम् ।
अर्धोन्मीलितलोचनैर्विचरतां वृन्दाटवीवीथिसु
कुत्रापि स्खलतां क्वचिच्च पततां यज्जीवनं जीवनम्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.65)
जो श्रीवृन्दावनके लता-गृहों में निवास करते हैं, श्रीगोविन्दकी लीलासुधाको पान करके अविरल अश्रु बहाते रहते हैं, (निरन्तर) प्रेम से सुमधुर श्रीराधा-नाम का गान करते हैं, अधखुले नेत्रों से श्रीवृन्दावन की गलियों में विचरते है तथा जिनको अपने शरीरकी किंचिन्मात्र भी सुध नहीं है, अतएव जो कभी लड़खड़ाते हैं, कभी भावावेश में गिर भी जाते हैं ऐसे (प्रेमोन्मत्त) महात्माओंका जो जीवन हैं, वही वास्तव में धन्य जीवन है !
मापीयाश्रु विमुञ्चतां सुमधुरं राधेति संगायताम् ।
अर्धोन्मीलितलोचनैर्विचरतां वृन्दाटवीवीथिसु
कुत्रापि स्खलतां क्वचिच्च पततां यज्जीवनं जीवनम्॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.65)
जो श्रीवृन्दावनके लता-गृहों में निवास करते हैं, श्रीगोविन्दकी लीलासुधाको पान करके अविरल अश्रु बहाते रहते हैं, (निरन्तर) प्रेम से सुमधुर श्रीराधा-नाम का गान करते हैं, अधखुले नेत्रों से श्रीवृन्दावन की गलियों में विचरते है तथा जिनको अपने शरीरकी किंचिन्मात्र भी सुध नहीं है, अतएव जो कभी लड़खड़ाते हैं, कभी भावावेश में गिर भी जाते हैं ऐसे (प्रेमोन्मत्त) महात्माओंका जो जीवन हैं, वही वास्तव में धन्य जीवन है !

