माया कौं सब जग भजै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (28)

माया कौं सब जग भजै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (28)

(कुण्डलियाँ)
माया कौं सब जग भजै, माधौ भजै न कोइ ।
जो कदापि माधौ भजै, माया चेरी होइ॥ [1]
माया चेरी होइ, रहै चरनन लपटानी।
ज्यों मलयज के संग, सहज सौरभ सुखदानी॥ [2]
भगवत रसिक अनन्य, होय सतगुरु की दाया।
माधौ सौं मन लगै, मोह मद छूटै माया॥ [3]

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (28)

समस्त संसार वास्तव में माया की ही भक्ति करता है — धन, स्त्री, गृह, आश्रम आदि में आसक्ति ही सबका साधन बन गई है। किंतु मायापति श्रीकृष्ण का अनन्य भजन तो कोई विरला ही करता है। और जो वास्तव में श्रीकृष्ण का अनन्य भजन करता है — उसके लिए माया स्वयं आज्ञाकारिणी दासी बन जाती है। [1]

और वह दासी भी कोई सामान्य नहीं, बल्कि ऐसी दासी बनती है जो उस भक्त के चरणों से सदा ऐसे लिपटी रहती है जैसे मलयज (चंदन) के संग जुड़ी हुई शीतल-सुगंधित सौरभ। [2]

जो जीव भगवान का निष्काम-अनन्य भाव से निरंतर भजन करता है, सद्गुरु की विशेष कृपा भी उसी पर होती है। ऐसा साधक सहज ही अनन्य रसिक बन जाता है — उसका चित्त स्वाभाविक रूप से श्रीहरि में रमने लगता है, और मोह, मद, माया जैसे बंधन उससे बिना किसी प्रयास के छूट जाते हैं। [3]