वसिये श्री वृन्दावन धाम।
अंग पुलकि निशि दिवस बोलिये, श्री राधे-राधे नाम। [1]
ललित-प्रिया जेहि त्यागि परमपद, पायहुँ नहीं विश्राम।
भाग बड़ो तब यह व्रज-रज में, पावत मन अभिराम॥ [2]
- रसिक वाणी
श्री वृन्दावन-धाम में वास करो — ऐसा वास जहाँ “श्री राधे–राधे” नाम को बोलने से शरीर का रोम-रोम पुलकित हो उठे । [1]
जो कोई श्री राधा-कृष्ण को त्यागकर किसी परम पद की कामना करता है, उसे कहीं भी शांति या विश्राम नहीं मिल सकता। सच्चा सौभाग्य तो उसी का है जो व्रज-रज को प्राप्त कर ले क्योंकि वही रज मन को परम शांति प्रदान करती है। [2]
अंग पुलकि निशि दिवस बोलिये, श्री राधे-राधे नाम। [1]
ललित-प्रिया जेहि त्यागि परमपद, पायहुँ नहीं विश्राम।
भाग बड़ो तब यह व्रज-रज में, पावत मन अभिराम॥ [2]
- रसिक वाणी
श्री वृन्दावन-धाम में वास करो — ऐसा वास जहाँ “श्री राधे–राधे” नाम को बोलने से शरीर का रोम-रोम पुलकित हो उठे । [1]
जो कोई श्री राधा-कृष्ण को त्यागकर किसी परम पद की कामना करता है, उसे कहीं भी शांति या विश्राम नहीं मिल सकता। सच्चा सौभाग्य तो उसी का है जो व्रज-रज को प्राप्त कर ले क्योंकि वही रज मन को परम शांति प्रदान करती है। [2]

