कौंन भाग्य भरि नैंन निहारौ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (267)

कौंन भाग्य भरि नैंन निहारौ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (267)

कौंन भाग्य भरि नैंन निहारौ।
बिनु नख चन्द्र चन्दिका देखे, त्रिभुवन सब अँधियारौ ॥ [1]
सहज छबीली छबि के ऊपर, त्रिभुवन सोभा वारौ ।
'भोरी' छिन इक दरसन कारण, कोटि प्राण तजि डारौ ॥ [2]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (267)

हे प्यारी जू! मेरा ऐसा भाग्य कब उदित होगा कि मैं अपने नेत्रों से आपके दर्शन करूंगीं? आपके श्रीचरणों की नख रूपी चन्द्रमाओं की परम अद्भुत चाँदनी को देखे बिना, मुझे तो इस संसार में सर्वत्र अँधेरा ही अँधेरा नजर आ रहा है। [1]

मैं आपकी सहज अनुपम-छवि के ऊपर, तीनों लोकों की सुन्दरता को न्यौछावर कर देना चाहती हूँ। श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि आपके एक क्षण के दर्शन लाभ पर मैं अपने कोटि-कोटि प्राणों को न्यौछावर कर डालूँगी । [2]