भला कहा रीझे नहीं बुरा कहा न खिजन्त- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (54)

भला कहा रीझे नहीं बुरा कहा न खिजन्त- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (54)

भला कहा रीझे नहीं, बुरा कहा न खिजन्त ।
‘रूप रसिक’ सोइ जानिये, आनन्द-रूपी सन्त ॥ 

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (54)

जो अपनी प्रशंसा सुनकर कभी अहंकार से फूलता नहीं और निंदा सुनकर तनिक भी क्रोधित या खिन्न नहीं होता, वही आनंदस्वरूप संत कहलाने का सच्चा अधिकारी होता है।