ज्यौं ज्यौं इत देखियत - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (01)

ज्यौं ज्यौं इत देखियत - श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (01)

(कवित्त)
ज्यौं ज्यौं इत देखियत मूरख विमुख लोग,
त्यौं त्यों सुखराशी व्रजवासी जिय भावैं हैं । [1]
खारे जल छीलर दुखारे अन्ध कूप चितै,
कालिन्दी के काज महा मन ललचावैं हैं ॥ [2]
जैसी अब बीतत सु कहत न आवैं बैंन,
नागर न चैन परैं प्रान अकुलावैं हैं। [3]
थोहर फरास देखि देखि कैं बंबूर बुरे,
हाय हरे हरे वे तमाल सुधि आवैं हैं ॥ [4]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (01)

एक बार श्री नागरीदास जी को किसी विशेष कारण से मरुस्थल जाना पड़ा। वहाँ की निर्जन भूमि में निवास करते हुए उनके हृदय में ब्रज की गहन स्मृति जाग उठी —
जैसे-जैसे मेरी दृष्टि इन भगवद-विमुख, प्रेमहीन जीवों पर पड़ती है, वैसे-वैसे ब्रजवासियों की निश्छल भक्ति और माधुर्य की स्मृति तीव्रतर होती जाती है। [1]

यहाँ के खारे जल वाले कुएँ देखकर मन व्याकुल हो उठता है और यमुना जी के मधुर जल का स्मरण और अधिक उग्र हो जाता है। [2]

कैसे दिन बीत रहे हैं — यह शब्दों में कह पाना कठिन है। ब्रज के बिना मेरा हृदय एक क्षण को भी शांत नहीं होता, भीतर एक तीव्र व्याकुलता उठती रहती है। [3]

श्री नागरीदास कहते हैं कि यहाँ के सूखे थूहर, काँटेदार फरास और निर्जीव बबूल के पेड़ों को देखकर मुझे ब्रज के सघन, सुंदर, श्यामल तमाल वृक्ष और उनकी शीतल छाया की उत्कट याद आती है। [4]