हम तो योंही भक्त कहाए - श्री किशोरी अलि

हम तो योंही भक्त कहाए - श्री किशोरी अलि

हम तो योंही भक्त कहाए ।
रसिक-जनन की संगति तजिकै, बिमुखन सनमुख धाए ॥ [1]
स्वॉग सिंघ कौ धारि स्वान सम, मन नै चाल चलाए ।
बिषयन के बस करिकै इंद्रिन, कपि लौं नाच नचाए ॥ [2]
कहनी सी करनी न करी कछु, जग-जन बहुत हँसाए ।
परम कृपालु किसोरी जू ने, ऐसे हू अपनाए ॥ [3]

- श्री किशोरी अलि

हम तो केवल नाम के भक्त हैं। रसिक संतों की संगति को त्यागकर, हम संसार और बिमुखों की ओर ही भागते रहे। [1]

शेर का स्वाँग भर रखा, पर चाल-चलन कुत्ते जैसा ही रहा। मन विषयों के वश में रहा और इन्द्रियों ने हमें बन्दर की तरह नचाया। [2]

जो कहा वह किया नहीं, आचरण केवल बातों तक ही सीमित रहा, और इस कारण से संसार के लोग हम पर हँसते रहे। फिर भी, करुणामयी श्री किशोरी जी (राधा) ने ऐसी दोषयुक्त स्थिति में भी हमे अपना लिया। ऐसी अकारण कृपा श्री राधा के अतिरिक्त और कौन कर सकता है? [3]