जेहि बिनु जाने कछुहि नहिं, जात्यौ जात बिसेष ।
सोइ प्रेम जेहि जानिकै, रहि न जात कछु सेष ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (18)
जिसे जाने बिना और किसी का बोध नहीं होता, और जिसे जानने पर स्वयं दिव्य ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् जिसका बोध हो जाने पर कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता, वही सारों का सार तत्त्व प्रेम है।
सोइ प्रेम जेहि जानिकै, रहि न जात कछु सेष ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (18)
जिसे जाने बिना और किसी का बोध नहीं होता, और जिसे जानने पर स्वयं दिव्य ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् जिसका बोध हो जाने पर कुछ भी जानने को शेष नहीं रह जाता, वही सारों का सार तत्त्व प्रेम है।

