(कवित्त)
जात रूप तखत पै बैठी रूप रासि राधे,
अंगन की प्रभा प्रभाकर को लजावतीं । [1]
चीर चारु हीर हार हीय पहिराय कर,
भूषन बनाय बाल साजन सजावतीं ॥ [2]
अतर गुलाब लै सुगन्धन लगावै सबै,
चन्दन चढ़ाय भाल भौरन भगावतीं । [3]
जोरि जोरि पानि देवतान हूँ की रानी ‘हठी’,
कोटि कोटि कोरनिस झुकि कै बजावतीं ॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (25)
रूप-सौंदर्य की अनंत राशि श्री राधा महारानी जब स्वर्ण-सिंहासन पर विराजती हैं, तो उनके अंगों की प्रभा स्वयं सूर्य के तेज को भी लज्जित कर देती है। [1]
उनकी निज सहचरियाँ प्रेमपूर्वक अपने कोमल हाथों से उन्हें सुंदर वस्त्रों, हीरे-मोती के हारों, और विलक्षण आभूषणों से अलंकृत करती हैं। [2]
वे गुलाब एवं सुगंधित द्रव्यों का अतर लगाकर उन्हें सुवासित करती हैं, एवं मस्तक पर चन्दन चढ़ाती हैं — सुगन्ध पर मंडराते भौंरों को भी हौले से हटा देती हैं। [3]
श्री हठी जी कहते हैं कि देवताओं की रानियाँ भी हाथ जोड़-जोड़कर आती हैं, और असंख्य बार झुककर श्री राधा महारानी को प्रणाम करती हुई और कोरनिस (गुंजायमान यंत्र) बजाती हुई उनके श्रीचरणों में नमन अर्पित करती हैं। [4]
जात रूप तखत पै बैठी रूप रासि राधे,
अंगन की प्रभा प्रभाकर को लजावतीं । [1]
चीर चारु हीर हार हीय पहिराय कर,
भूषन बनाय बाल साजन सजावतीं ॥ [2]
अतर गुलाब लै सुगन्धन लगावै सबै,
चन्दन चढ़ाय भाल भौरन भगावतीं । [3]
जोरि जोरि पानि देवतान हूँ की रानी ‘हठी’,
कोटि कोटि कोरनिस झुकि कै बजावतीं ॥ [4]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (25)
रूप-सौंदर्य की अनंत राशि श्री राधा महारानी जब स्वर्ण-सिंहासन पर विराजती हैं, तो उनके अंगों की प्रभा स्वयं सूर्य के तेज को भी लज्जित कर देती है। [1]
उनकी निज सहचरियाँ प्रेमपूर्वक अपने कोमल हाथों से उन्हें सुंदर वस्त्रों, हीरे-मोती के हारों, और विलक्षण आभूषणों से अलंकृत करती हैं। [2]
वे गुलाब एवं सुगंधित द्रव्यों का अतर लगाकर उन्हें सुवासित करती हैं, एवं मस्तक पर चन्दन चढ़ाती हैं — सुगन्ध पर मंडराते भौंरों को भी हौले से हटा देती हैं। [3]
श्री हठी जी कहते हैं कि देवताओं की रानियाँ भी हाथ जोड़-जोड़कर आती हैं, और असंख्य बार झुककर श्री राधा महारानी को प्रणाम करती हुई और कोरनिस (गुंजायमान यंत्र) बजाती हुई उनके श्रीचरणों में नमन अर्पित करती हैं। [4]

