लखि औगुन तन आपनै, भूल सबै सुधि जाइ ।
अधम-उधारन-विरद तुव, ‘रसनिधि’ सुमिर सुहाइ ॥
- श्री रसनिधि
जब मैं अपने दोषों की ओर दृष्टि करता हूँ, तब भय से मेरा मन व्याकुल हो उठता है और मैं अपनी सुध-बुध खो बैठता हूँ। किन्तु हे प्रभु! जब मैं आपकी “पतित-पावन” और “अधम-उधारन” जैसी उपाधियों का स्मरण करता हूँ, तो हृदय में यह गहरा संतोष उत्पन्न होता है कि — ऐसे कृपालु प्रभु मेरा भी उद्धार अवश्य करेंगे।
अधम-उधारन-विरद तुव, ‘रसनिधि’ सुमिर सुहाइ ॥
- श्री रसनिधि
जब मैं अपने दोषों की ओर दृष्टि करता हूँ, तब भय से मेरा मन व्याकुल हो उठता है और मैं अपनी सुध-बुध खो बैठता हूँ। किन्तु हे प्रभु! जब मैं आपकी “पतित-पावन” और “अधम-उधारन” जैसी उपाधियों का स्मरण करता हूँ, तो हृदय में यह गहरा संतोष उत्पन्न होता है कि — ऐसे कृपालु प्रभु मेरा भी उद्धार अवश्य करेंगे।

