(सवैया)
श्वान कहूं कि शृगाल कहूं कि,
विडाल कहूं मन की मत्ति तैसी। [1]
ढेढ कहूं किधौ डूम कहूं किधौ,
भाड कहूं कि भडाइ दे जैसी॥ [2]
चौर कहूं, वट मार कहूं,
ठग जाइ कहूं, उपमा कहूं कैसी। [3]
सुन्दर और कहा कहिये अब,
या मन की गति दीसत ऐसी॥ [4]
- श्री सुंदरदास जी
मैं इस मन की विचित्र गति को क्या कहूँ? कभी इसकी प्रवृत्ति कुत्ते जैसी प्रतीत होती है, जो लोभ और भूख से हमेशा व्याकुल रहता है; कभी सियार जैसी, जो छल-कपट से भरा है; और कभी बिल्ली जैसी, जो बाहर से शांत किन्तु भीतर से धूर्त होती है। [1]
कभी यह मन ढेढ़ (अछूत) जैसा आचरण करता है — अपवित्र, अनुचित विचारों में डूबा हुआ; कभी डोम (श्मशान में शवों का संस्कार करने वाला) जैसा, जो केवल मृत्यु और नाश की दिशा में चलता है; और कभी भांड जैसा, जो सब कुछ एक नाटक समझकर उथल-पुथल मचाता है। [2]
कभी यह चोर की भाँति छिपकर विकार करता है, कभी डाकू की तरह हिंसक बन जाता है, और कभी ठग की तरह धोखा देता है — अब कौन सी उपमा दूँ इस मन की, जो किसी सीमा में नहीं आता? [3]
सुन्दरदास कहते हैं — सच तो यह है कि इस मन की गति अत्यंत भयावह, विकट और दुष्टतापूर्ण है। यही हमारी सारी समस्याओं की जड़ है। [4]
श्वान कहूं कि शृगाल कहूं कि,
विडाल कहूं मन की मत्ति तैसी। [1]
ढेढ कहूं किधौ डूम कहूं किधौ,
भाड कहूं कि भडाइ दे जैसी॥ [2]
चौर कहूं, वट मार कहूं,
ठग जाइ कहूं, उपमा कहूं कैसी। [3]
सुन्दर और कहा कहिये अब,
या मन की गति दीसत ऐसी॥ [4]
- श्री सुंदरदास जी
मैं इस मन की विचित्र गति को क्या कहूँ? कभी इसकी प्रवृत्ति कुत्ते जैसी प्रतीत होती है, जो लोभ और भूख से हमेशा व्याकुल रहता है; कभी सियार जैसी, जो छल-कपट से भरा है; और कभी बिल्ली जैसी, जो बाहर से शांत किन्तु भीतर से धूर्त होती है। [1]
कभी यह मन ढेढ़ (अछूत) जैसा आचरण करता है — अपवित्र, अनुचित विचारों में डूबा हुआ; कभी डोम (श्मशान में शवों का संस्कार करने वाला) जैसा, जो केवल मृत्यु और नाश की दिशा में चलता है; और कभी भांड जैसा, जो सब कुछ एक नाटक समझकर उथल-पुथल मचाता है। [2]
कभी यह चोर की भाँति छिपकर विकार करता है, कभी डाकू की तरह हिंसक बन जाता है, और कभी ठग की तरह धोखा देता है — अब कौन सी उपमा दूँ इस मन की, जो किसी सीमा में नहीं आता? [3]
सुन्दरदास कहते हैं — सच तो यह है कि इस मन की गति अत्यंत भयावह, विकट और दुष्टतापूर्ण है। यही हमारी सारी समस्याओं की जड़ है। [4]

