सबसौ सुन्दर है बरसानों व्रज में - ब्रज के लोकगीत

सबसौ सुन्दर है बरसानों व्रज में - ब्रज के लोकगीत

सबसौ सुन्दर है बरसानों व्रज में राधारानी कौं।
जहाँ बिराजैं राधारानी, जाकी श्याम करै अगवानी,
महिमा वेदन हू नॉय जानी, पर्वत ऊनी मंदिर चमकै,
सब जग जानी कौ ॥ [1] सबसौ सुन्दर—––––॥

खोर साँकरी बड़ी रसीली, दधि लै चली कुँवरि गर्वीली,
सखी सँग में वहुत हठीली, आगे मोहन गैल रोक दियो,
रूप लुभानी कौ॥ [2] सबसौ सुन्दर—––––॥

दै जा दान कुँवरि रसिया कौ, पीत पिछौरी कटि कसिया कौ,
कुँवरि हँसी लखि मन वसिया कौ, घूँघट में ते छीन लियौ मन,
वा मनमानी कौ॥ [3] सबसौ सुन्दर—––––॥

- ब्रज के लोकगीत

व्रजधाम में सबसे सुंदर बरसाना धाम है क्योंकि वहाँ साक्षात श्रीराधारानी विराजती हैं। जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण भी उनकी अगवानी करते हैं और जिसकी महिमा वेदों द्वारा भी पूर्ण रूप से वर्णित नहीं हो पाती। उसी बरसाने में, ब्रह्माचल पर्वत के शिखर पर स्थित श्री राधा रानी का भव्य मंदिर अनुपम शोभा बिखेरता है। [1]

जब श्री राधा, अपने सौंदर्य और गरिमा से युक्त, सखियों के संग दही लेकर साँकरी खोर से निकलती हैं, तो मार्ग में श्रीकृष्ण अचानक प्रकट होकर उनका रास्ता रोक लेते हैं। यह लीला, यह दृश्य — बरसाना धाम की अनुपम लीलाओं में से एक है। [2]

तब श्रीकृष्ण, पीले वस्त्रों में शोभायमान, कटि पर काछनी बाँधे, श्रीराधा से दान माँगते हैं। श्रीराधा की एक मधुर हँसी ही श्रीकृष्ण के हृदय को अपने वश में कर लेती है। वह घूँघट के भीतर रहकर भी छलिया श्रीकृष्ण के चित्त को चुरा लेती हैं। ऐसी अनुपम लीलाओं से परिपूर्ण है यह रसराज बरसाना धाम। [3]