हरि मोहिं यों अपनाय लियौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (118)

हरि मोहिं यों अपनाय लियौ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (118)

हरि मोहिं यों अपनाय लियौ ।
जहाँ जहाँ बिघन जान्यौ अपने कों, तहाँ तहाँ जतन कियौ॥ [1]
हौं तौ पतित अपराधी अतिसै, कृपा कटाक्षि जियौ ।
श्रीबिहारीदास प्रभु अति करुनामय, प्रगट प्रसाद दियौ॥ [2]

- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (118)

हे हरि! आपने मुझे ऐसे अपनाया कि जहाँ-जहाँ भी आपने मेरे जीवन में बाधाएँ देखीं, वहाँ-वहाँ आपने स्वयं ही उनका निवारण किया है । [1]

मैं तो अत्यंत पतित और अपराधी हूँ, फिर भी आपने अपनी कृपा-दृष्टि से मुझे संभालकर रखा, मेरा जीवन चलाया। श्री बिहारिन देव कहते हैं कि अति करुना-सागर श्रीबिहारीजी महाराज ने ये प्रकट कृपा रूपी महाप्रसाद मुझे प्रदान किया है। [2]