न काहू को निन्दनौ ना काहू की संस - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (20)

न काहू को निन्दनौ ना काहू की संस - श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (20)

न काहू को निन्दनौ, ना काहू की संस ।
कान्त रसिक हरिदास जू, मेरे उर अवतंस ॥

- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, दोहा (20)

मैं न तो किसी की निन्दा करूँ, न ही किसी की चापलूसी करूँ। श्री कान्त रसिक कहते हैं कि मेरे हृदय के परम आभूषण रूपी हार एक मात्र स्वामी श्री हरिदास जू ही हैं।