अनन्य व्रत खाँडेकीसी धार।
इत-उत डगत जगत हिततेहरि, फेरि न करत सम्हार॥ [1]
कहा ग्यासि कुल-कर्मनि छाँड़े, जोलगि विषय विकार ।
बिनु प्रेमहि, न प्रसाद नेम तहाँ, हरि न ग्रहत ज्यौंनार॥ [2]
कौन काम कीरति बिनु प्रीतिहि, गनिका कैसो जार।
व्यासदासकी पति गति नासै, गयैं पराये द्वार ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (175)
अनन्य-भक्ति का व्रत तलवार की धार के समान सूक्ष्म और कठिन है। यदि मन इधर-उधर डगमगाकर संसार के मोहों में फिसल जाता है, तो फिर यद्यपि हरि जगत के हितैषी हैं, परन्तु ऐसी डगमगाई भक्ति का वे सम्हार (स्वीकार) नहीं करते। [1]
केवल जाति या कुल के कर्मों का त्याग कर देने से क्या लाभ, यदि मन अभी भी विषय-विकारों में डूबा है। बिना प्रेम के, न नियम-धर्म का मूल्य है, न ही प्रसाद का — क्योंकि हरि केवल भाव (प्रेम सहित) को ही ग्रहण करते हैं। जैसे कोई पति पतिव्रता से रहित पत्नी को स्वीकार नहीं करता, वैसे ही श्रीहरि भी प्रेमविहीन कर्मों को अस्वीकार कर देते हैं। [2]
प्रेम रहित यश और कीर्ति भी व्यर्थ है — वह उसी तरह है जैसे वेश्या से किया गया सम्बन्ध, जिसमें प्रेम नहीं, केवल स्वार्थ होता है। श्री हरिराम व्यास कहते हैं: पत्नी यदि पराए द्वार चली जाए, तो उसकी पतिव्रता मर्यादा टूट जाती है; वैसे ही जब भक्ति में अनन्यता खंडित हो जाती है, तो वह दूषित हो जाती है। [3]
इत-उत डगत जगत हिततेहरि, फेरि न करत सम्हार॥ [1]
कहा ग्यासि कुल-कर्मनि छाँड़े, जोलगि विषय विकार ।
बिनु प्रेमहि, न प्रसाद नेम तहाँ, हरि न ग्रहत ज्यौंनार॥ [2]
कौन काम कीरति बिनु प्रीतिहि, गनिका कैसो जार।
व्यासदासकी पति गति नासै, गयैं पराये द्वार ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (175)
अनन्य-भक्ति का व्रत तलवार की धार के समान सूक्ष्म और कठिन है। यदि मन इधर-उधर डगमगाकर संसार के मोहों में फिसल जाता है, तो फिर यद्यपि हरि जगत के हितैषी हैं, परन्तु ऐसी डगमगाई भक्ति का वे सम्हार (स्वीकार) नहीं करते। [1]
केवल जाति या कुल के कर्मों का त्याग कर देने से क्या लाभ, यदि मन अभी भी विषय-विकारों में डूबा है। बिना प्रेम के, न नियम-धर्म का मूल्य है, न ही प्रसाद का — क्योंकि हरि केवल भाव (प्रेम सहित) को ही ग्रहण करते हैं। जैसे कोई पति पतिव्रता से रहित पत्नी को स्वीकार नहीं करता, वैसे ही श्रीहरि भी प्रेमविहीन कर्मों को अस्वीकार कर देते हैं। [2]
प्रेम रहित यश और कीर्ति भी व्यर्थ है — वह उसी तरह है जैसे वेश्या से किया गया सम्बन्ध, जिसमें प्रेम नहीं, केवल स्वार्थ होता है। श्री हरिराम व्यास कहते हैं: पत्नी यदि पराए द्वार चली जाए, तो उसकी पतिव्रता मर्यादा टूट जाती है; वैसे ही जब भक्ति में अनन्यता खंडित हो जाती है, तो वह दूषित हो जाती है। [3]

