मन वच काइक एक रस, धरे महा व्रत प्रेम ।
प्रान प्रियहिं सेवत कुँवर, याही सुख कौ नेम॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (28)
मन, वचन और देह तीनों को एक-रस रखकर अर्थात पूरी एकाग्रता से, केवल एक प्रेम का महाव्रत धारण किए हुए, रसिक कुँवर लालजू (श्री कृष्ण) श्रीराधा की सेवा में पूर्णत: तत्पर रहते हैं। उनका श्री राधा को निरंतर सुख पहुंचाना ही एक मात्र सुखमय नियम है। वे अन्य किसी नियम को नहीं मानते।
प्रान प्रियहिं सेवत कुँवर, याही सुख कौ नेम॥
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, प्रेमावली (28)
मन, वचन और देह तीनों को एक-रस रखकर अर्थात पूरी एकाग्रता से, केवल एक प्रेम का महाव्रत धारण किए हुए, रसिक कुँवर लालजू (श्री कृष्ण) श्रीराधा की सेवा में पूर्णत: तत्पर रहते हैं। उनका श्री राधा को निरंतर सुख पहुंचाना ही एक मात्र सुखमय नियम है। वे अन्य किसी नियम को नहीं मानते।

