कहत जु बात अरी सुनि ललिता।
पिय के संग रंग की बातें, क्यौं तुम प्रगट करत हित-सलिता॥ [1]
तुमकौं काज और कछु नाहीं, लाज की आज मजाजहि दलिता।
‘वृन्दावन रानी' कर-कमल सु, कमलहि दै हँसिकै वन चलिता॥ [2]
- श्री वृन्दावन दास जी
श्री राधा ललिता जू से कहती हैं — अरी ललिता! प्रियतम के संग प्रेम की अंतरंग गोपनीय बातें क्यों प्रकट कर रसधारा बहाती हो? [1]
तुम्हें तो और कोई काम ही नहीं है। आज तो तुमने समस्त लाज की मर्यादा को ही समाप्त कर दिया है। श्री वृन्दावन दास कहते हैं कि वृन्दावन की महारानी, श्री राधा अपने कर-कमलों से एक कमल का फूल ललिता जी को प्रदान करती हुई, हँसकर वन की ओर चली गईं। [2]
पिय के संग रंग की बातें, क्यौं तुम प्रगट करत हित-सलिता॥ [1]
तुमकौं काज और कछु नाहीं, लाज की आज मजाजहि दलिता।
‘वृन्दावन रानी' कर-कमल सु, कमलहि दै हँसिकै वन चलिता॥ [2]
- श्री वृन्दावन दास जी
श्री राधा ललिता जू से कहती हैं — अरी ललिता! प्रियतम के संग प्रेम की अंतरंग गोपनीय बातें क्यों प्रकट कर रसधारा बहाती हो? [1]
तुम्हें तो और कोई काम ही नहीं है। आज तो तुमने समस्त लाज की मर्यादा को ही समाप्त कर दिया है। श्री वृन्दावन दास कहते हैं कि वृन्दावन की महारानी, श्री राधा अपने कर-कमलों से एक कमल का फूल ललिता जी को प्रदान करती हुई, हँसकर वन की ओर चली गईं। [2]

