लोचन लालची महारी !
लोकलाज कुलकानि सबै तजि, चितवत लालविहारी ॥ [1]
तन वाजार हाट अंग अंगनि, सौदा करत न हारी ।
भरत अहर्निस हृदय भण्डारनि, देत न एक लगारी ॥ [2]
नफा वहुत आवत है तोपै, अधिक अधिक अधिकारी ।
'रूपरसिक' रस-लोभ लपेटे, अड़े बड़े ब्योपारी ॥ [3]
- श्री रूपरसिक देवाचार्य
मेरी आँखें ऐसी लालची हो गई हैं कि लोक-लाज और कुल-मान की परवाह छोड़कर केवल श्रीलालविहारी (श्री कृष्ण) के दर्शन में ही तल्लीन रहती हैं। [1]
यह शरीर मानो एक विशाल बाजार है, जहाँ प्रत्येक अंग-प्रत्यंग श्रीलालजू के सौदे में लगा हुआ है, और यह व्यापार दिन-रात हृदय-भंडार को भरता जाता है, परन्तु कभी भी घाटा नहीं खा रहा। [2]
इस व्यापार में इतना अधिक लाभ मिलता है कि लाभ पर लाभ बढ़ता ही जाता है। ‘रूपरसिक’ कहते हैं कि यह रस-लोभ का अद्भुत व्यापार है, जिसमें रसिक रूपी व्यापारी दृढ़तापूर्वक अड़कर खड़े रहते हैं। [3]
लोकलाज कुलकानि सबै तजि, चितवत लालविहारी ॥ [1]
तन वाजार हाट अंग अंगनि, सौदा करत न हारी ।
भरत अहर्निस हृदय भण्डारनि, देत न एक लगारी ॥ [2]
नफा वहुत आवत है तोपै, अधिक अधिक अधिकारी ।
'रूपरसिक' रस-लोभ लपेटे, अड़े बड़े ब्योपारी ॥ [3]
- श्री रूपरसिक देवाचार्य
मेरी आँखें ऐसी लालची हो गई हैं कि लोक-लाज और कुल-मान की परवाह छोड़कर केवल श्रीलालविहारी (श्री कृष्ण) के दर्शन में ही तल्लीन रहती हैं। [1]
यह शरीर मानो एक विशाल बाजार है, जहाँ प्रत्येक अंग-प्रत्यंग श्रीलालजू के सौदे में लगा हुआ है, और यह व्यापार दिन-रात हृदय-भंडार को भरता जाता है, परन्तु कभी भी घाटा नहीं खा रहा। [2]
इस व्यापार में इतना अधिक लाभ मिलता है कि लाभ पर लाभ बढ़ता ही जाता है। ‘रूपरसिक’ कहते हैं कि यह रस-लोभ का अद्भुत व्यापार है, जिसमें रसिक रूपी व्यापारी दृढ़तापूर्वक अड़कर खड़े रहते हैं। [3]

