किं कृष्णस्यैव रूपं त्रिभुवनमनसो हारि किं यूथपायाः
प्रेमामूर्त्तः किमीष्टे किमु विजयते केलिरेवानयो र्वा ।
इत्थं यत्रैव राधा प्रणयसहचरी संचयामोदवृन्दाद्
वंभ्रम्यन्ते सुरम्यां प्रणमत सरसीं तां महद्भिः सुनम्याम् ॥
- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (46)
अहो! श्रीराधाकुण्ड का कैसा अद्भुत स्वरूप है! क्या यह त्रिभुवन-मनोहर श्रीकृष्ण का ही रूप है जो कुण्ड के रूप में विराजमान है? या फिर यह यूथेश्वरी श्रीराधा का प्रेम ही मूर्तिमान होकर कुण्ड के रूप में शोभित है? या दोनों (राधा-कृष्ण) की दिव्य क्रीड़ा ही इस रूप में विजयी होकर प्रकट हुई है? इस प्रकार का संदेह करती हुई, जहाँ श्रीराधा की प्रणय-सखियाँ, अत्यधिक आमोद-विलास में भ्रमित होकर इधर-उधर घूमती रहती हैं, ऐसे सुरम्य, महापुरुषों द्वारा पूज्य और नमनीय श्रीराधा-कुण्ड को प्रणाम करो।
प्रेमामूर्त्तः किमीष्टे किमु विजयते केलिरेवानयो र्वा ।
इत्थं यत्रैव राधा प्रणयसहचरी संचयामोदवृन्दाद्
वंभ्रम्यन्ते सुरम्यां प्रणमत सरसीं तां महद्भिः सुनम्याम् ॥
- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (46)
अहो! श्रीराधाकुण्ड का कैसा अद्भुत स्वरूप है! क्या यह त्रिभुवन-मनोहर श्रीकृष्ण का ही रूप है जो कुण्ड के रूप में विराजमान है? या फिर यह यूथेश्वरी श्रीराधा का प्रेम ही मूर्तिमान होकर कुण्ड के रूप में शोभित है? या दोनों (राधा-कृष्ण) की दिव्य क्रीड़ा ही इस रूप में विजयी होकर प्रकट हुई है? इस प्रकार का संदेह करती हुई, जहाँ श्रीराधा की प्रणय-सखियाँ, अत्यधिक आमोद-विलास में भ्रमित होकर इधर-उधर घूमती रहती हैं, ऐसे सुरम्य, महापुरुषों द्वारा पूज्य और नमनीय श्रीराधा-कुण्ड को प्रणाम करो।

