श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (46)

श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (46)

श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार।
जिन वनचरिन आचरन कुत्सित, जग जेहि कह व्यभिचार॥
तिन कहँ निज सहचरि करि हरि सों, करवावति मनुहार ।
जेहि रासहिं तरसति कमला सी, तप करि-करि गइ हार॥
तेहि वनचरिहिं सखिन किय रासहिं, को अस सरल उदार।
कह 'कृपालु' यह जानि गहहु मन ! शरण गौर सरकार॥

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (46)

श्री राधा जू के दरबार में अधाधुंध (बेहिसाब) कृपा बरसती है। जिन ब्रज की वनचारी स्त्रियों का आचरण संसार की दृष्टि में निंदनीय और व्यभिचारी कहा जाता है क्योंकि वे पति के घर में रहते हुए भी, श्रीकृष्ण को (उन्हें पूर्ण ब्रह्म रूप में न जानते हुए भी) परपुरुष मानकर अनन्य प्रेम करती थीं, उन्हीं गोपिकाओं को श्री राधा ने अपनी निज-सहचरियाँ बना लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने स्वयं श्रीकृष्ण को उनकी प्रेम-पूर्वक मनुहार करने के लिए विवश कर दिया। जिस महारास में महालक्ष्मी जैसी देवी भी युगों तप करने के बाद भी प्रवेश न पा सकीं, उसी रास में किशोरी जी ने उन गोपिकाओं को अपनी प्राणसखी बनाकर स्थान दिया।ऐसी सरल, उदार और करुणा स्वामिनी से युक्त श्री राधा के अतिरिक्त और कौन हो सकता है? जगद्गुरु श्री कृपालु जी कहते हैं — अरे मन! ऐसी परम उदार स्वामिनी के दरबार की करुणा जानकर, तू उन अलबेली सरकार के युगल चरणों की शरण ग्रहण कर।