कै ह्वै रहौं द्रुम गुल्म लता बेली बन माहीं - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (67.1)

कै ह्वै रहौं द्रुम गुल्म लता बेली बन माहीं - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (67.1)

कै ह्वै रहौं द्रुम गुल्म लता बेली बन माहीं ।
आवत जात सुभाय परै मोपै परछाहीं ॥

- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, भँवर गीत (67.1)

ब्रह्मज्ञानी उद्धव भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं — “हे प्रभु! अब मैं सदा-सदा के लिए ब्रज का कोई वृक्ष, लता या वेलि बनकर ब्रज में ही रहना चाहता हूँ, ताकि जब ये प्रेम की ध्वजा स्वरूप ब्रजांगनाएँ इधर-उधर विचरण करें, तो उनकी छाया स्वाभाविक रूप से मुझ पर पड़े और मैं कृतार्थ हो जाऊँ।”