अग्र उभय ताकि बनी, है सन्तनके साथ - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली (1.45)

अग्र उभय ताकि बनी, है सन्तनके साथ - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली (1.45)

‘अग्र’ उभय ताकि बनी, है सन्तनके साथ।
इक द्वै द्वै अरु चूपरी, पुनि लाडू दो हाथ॥

- श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली (1.45)

श्री अग्रस्वामी जी कहते हैं कि जो संतों का संग करते हैं और उनकी आज्ञा में चलते हैं, उनका सब प्रकार से कल्याण हो जाता है। जब तक वे संसार में रहते हैं, अलौकिक आनंद को प्राप्त करते हैं, और परलोक में भी वे सुंदर फल प्राप्त कर सदा रस-मग्न रहते हैं। ऐसे जीवों के दोनों हाथों में लड्डू रहता है।