सरद उज्यारी रास रच्यौ पिय-प्यारी - श्री प्रियादास, भक्ति रस बोधिनी (371)

सरद उज्यारी रास रच्यौ पिय-प्यारी - श्री प्रियादास, भक्ति रस बोधिनी (371)

(कवित्त)
सरद उज्यारी, रास रच्यौ पिय-प्यारी,
तामैं रंग चढ़यौ भारी, कैसै कहिकै सुनाइये। [1]
प्रिया अति गति लई, बीजुरी सी कौंधि गई,
चकचौंधी भई, छवि मंडल में छाइये ॥ [2]
नूपुर सो टूटि परयौ, मन अरबरयौ भयौ,
तोरि कै जनेऊ बाँध्यौ वाही भाँति भाइये। [3]
सकल समाज में यौं कह्यौ - 'आज काम आयौ,
ढोयौ हौ जनम', ताकी बात जिय आइये ॥ [4]

- श्री प्रियादास, भक्ति रस बोधिनी (371)

भक्तमाल की टीका में श्री प्रियादास जी, श्री हरिराम व्यास जी के जीवन के एक अनुपम प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखते हैं —

शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि में जब प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) ने दिव्य रास रचा, तब उसमें ऐसा गहन प्रेम-रंग चढ़ा कि उसकी मधुरता को शब्दों में बाँधना असम्भव है । [1]

श्री राधा ने रास में ऐसी अद्भुत गति धारण की मानो बिजली सी कौंध उठी हो — चारों ओर उनकी छवि की चकाचौंध फैल गई, और सम्पूर्ण रास-मंडल उस आभा में नहा गया। [2]

इसी बीच रास करते समय श्री राधा जू के चरणों का एक नूपुर टूटकर गिर पड़ा — यह देखकर हरिराम व्यास जी का हृदय प्रेमातिरेक में छटपटा कर उछल पड़ा। उन्होंने तत्काल अपने जनेऊ को तोड़कर, उस नूपुर के स्थान पर श्री राधा के चरणों में बाँध दिया। [3]

इसके बाद वे सम्पूर्ण रसिक समाज के समक्ष भाव-विभोर होकर कहते हैं — “इस जनेऊ को जीवन भर ढोता रहा, पर कभी किसी काम न आया। वास्तव में यह आज ही सार्थक हुआ है — जब यह श्री राधा के चरणों की सेवा में काम आया।” हरिराम व्यास जी के इस भाव-वाक्य को सुनकर समस्त रसिकगण प्रेम-भाव से अभिभूत हो उठे। [4]