कोटि विश्व ऐश्वर्य सुख, नहिं जु एक कण तूल।
सो रज तोकौं खेल है, मेरी जीवन मूल ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर, सोहनी महिमा (435.10)
श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि अरी सोहनी ! करोड़ों विश्व के वैभव से प्राप्त होने वाला सुख, इस वृन्दावन की रज के एक कण की समता नहीं कर सकता है। इस रज को झाड़कर फेंकना तू अपना एक खेल मात्र ही समझती है, जब कि यह मेरी प्राण संजीवनी है।
सो रज तोकौं खेल है, मेरी जीवन मूल ॥
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर, सोहनी महिमा (435.10)
श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि अरी सोहनी ! करोड़ों विश्व के वैभव से प्राप्त होने वाला सुख, इस वृन्दावन की रज के एक कण की समता नहीं कर सकता है। इस रज को झाड़कर फेंकना तू अपना एक खेल मात्र ही समझती है, जब कि यह मेरी प्राण संजीवनी है।

