(दोहा)
पूरन प्रेम प्रकास कें, परी पयोधनि पूरि ।
जय श्रीराधा रस-भरी, स्याम सजीवन मूरि ॥
(पद)
जय श्रीराधिका रसभरी ।
रसिक सुन्दर साँवरे की प्रान-जीवन-जरी ॥ [1]
गौर अंग अनंग अद्भुत सुरति-रंगनि-ररी ।
सहज संग अभंग जोरी सुभग-साँचे-ढरी ॥ [2]
परम प्रेम-प्रकास-पूरन पर पयोधिनि परी ।
हितू श्रीहरिप्रिया निरखति निकट निज सहचरी ॥ [3]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (32)
(दोहा)
रस से परिपूर्ण उन श्री राधारानी की सदा जय हो, जो श्यामसुंदर के प्राणों की संजीवनी हैं। जिनकी कृपा से ही पूर्ण प्रेम प्रकाशित हुआ है और जो प्रेम-सागर को परिपूर्ण करके उसमें स्वयं ही निमग्न हो गई हैं।
(पद)
रस से परिपूर्ण श्री राधा महारानी की सदा ही जय हो जो रसिक सुन्दर साँवरें के प्राणों की संजीवनी हैं। [1]
जिनके गौर स्वरूप दिव्य प्रेम एवं सुरत केली रंगों से रञ्जित है। जो सदा अभंग जोड़ी (अर्थात् अपने युगल स्वरूप श्री कृष्ण एवं श्री राधा) स्वरूप से नित्य विहार करती हैं (कभी भी उनसे अलग नहीं होती) । जिनके अंग प्रति अंग मानो सौभाग्य रूपी साँचे में स्वाभाविक ढले हुए हैं। [2]
परम प्रेम का पूर्ण प्रकाश केवल श्री राधा महारानी के द्वारा ही हुआ है और वे उसी परम प्रेम रूपी समुद्र में स्वयं निमग्न हैं। श्रीहरिप्रिया सहचरी अपनी सखियों के संग सदा इनको सदा निकट से देखती रहती हैं। [3]
पूरन प्रेम प्रकास कें, परी पयोधनि पूरि ।
जय श्रीराधा रस-भरी, स्याम सजीवन मूरि ॥
(पद)
जय श्रीराधिका रसभरी ।
रसिक सुन्दर साँवरे की प्रान-जीवन-जरी ॥ [1]
गौर अंग अनंग अद्भुत सुरति-रंगनि-ररी ।
सहज संग अभंग जोरी सुभग-साँचे-ढरी ॥ [2]
परम प्रेम-प्रकास-पूरन पर पयोधिनि परी ।
हितू श्रीहरिप्रिया निरखति निकट निज सहचरी ॥ [3]
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (32)
(दोहा)
रस से परिपूर्ण उन श्री राधारानी की सदा जय हो, जो श्यामसुंदर के प्राणों की संजीवनी हैं। जिनकी कृपा से ही पूर्ण प्रेम प्रकाशित हुआ है और जो प्रेम-सागर को परिपूर्ण करके उसमें स्वयं ही निमग्न हो गई हैं।
(पद)
रस से परिपूर्ण श्री राधा महारानी की सदा ही जय हो जो रसिक सुन्दर साँवरें के प्राणों की संजीवनी हैं। [1]
जिनके गौर स्वरूप दिव्य प्रेम एवं सुरत केली रंगों से रञ्जित है। जो सदा अभंग जोड़ी (अर्थात् अपने युगल स्वरूप श्री कृष्ण एवं श्री राधा) स्वरूप से नित्य विहार करती हैं (कभी भी उनसे अलग नहीं होती) । जिनके अंग प्रति अंग मानो सौभाग्य रूपी साँचे में स्वाभाविक ढले हुए हैं। [2]
परम प्रेम का पूर्ण प्रकाश केवल श्री राधा महारानी के द्वारा ही हुआ है और वे उसी परम प्रेम रूपी समुद्र में स्वयं निमग्न हैं। श्रीहरिप्रिया सहचरी अपनी सखियों के संग सदा इनको सदा निकट से देखती रहती हैं। [3]

