बहुत भूमि इत-उत फिरयौ, माया बस झकझोर।
अब कब ह्वैहैं सफल पगे, वृन्दावन की ओर॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)
बहुत समय से मैं माया से मोहित होकर संसार में यहाँ-वहाँ भटक रहा हूँ। हाय! वह शुभ दिन कब आएगा जब मेरे पाँव वास्तव में सफल होंगे — जब वे वृंदावन की ओर बढ़ेंगे और कभी वापस नहीं लौटेंगे।
अब कब ह्वैहैं सफल पगे, वृन्दावन की ओर॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह)
बहुत समय से मैं माया से मोहित होकर संसार में यहाँ-वहाँ भटक रहा हूँ। हाय! वह शुभ दिन कब आएगा जब मेरे पाँव वास्तव में सफल होंगे — जब वे वृंदावन की ओर बढ़ेंगे और कभी वापस नहीं लौटेंगे।

