जिहिं जिहिं अंगनि दृष्टि परतहो लडैती - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (35)

जिहिं जिहिं अंगनि दृष्टि परतहो लडैती - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (35)

(राग देवगंधार)
जिहिं जिहिं अंगनि दृष्टि परतहो लडैती,
तहाँ तहाँ अटकि रहत मन मेरो।
तेरी सौंहन खाऊँ लाखन, हों तो तेरो चेरौं॥ [1]
तेरी ये आस बिहार करत नित, तुम उपजीव हेरों।
रसिकन श्री ललिता सखी कृपाते, मो हिय सेबन तेरो ॥ [2]

- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (35)

हे प्यारीजू! तुम्हारे जिस-जिस अंग पर मेरी दृष्टि पड़ती है, मेरा मन वहीं ठहर जाता है। मैं तुम्हारी सौगंध खाकर यह कहता हूँ कि मैं तुम्हारा ही नित्य दास हूँ। [1]

तुम्हारे आसरे से ही मैं नित्य विहार-रस का पान करता हूँ, और तुम ही मेरे जीवन का परम आधार हो। श्री वंशी अलि कहते हैं — रसिकों की अनुकंपा और श्री ललिता सखी की कृपा से मेरा चित्त निरंतर तुम्हारे चरणों की सेवा में ही लगा रहता है। [2]