प्यारी तोहि कैसै कै मान मनाऊँ - श्री रामराय जी, आदिवाणी (37)

प्यारी तोहि कैसै कै मान मनाऊँ - श्री रामराय जी, आदिवाणी (37)

प्यारी! तोहि कैसै कै मान मनाऊँ।
सब विधि विवश, राजधानी वसि, छदम कदम बहु बात बनाऊँ॥ [1]
गुन-आगर, सागर करुना की, कौन नवीन केलि जो जनाऊँ।
‘श्रीरामराय’ तव पद-पंकज नवि, निपट दीन तन हा-हा खाऊँ॥ [2]

- श्री रामराय जी, आदिवाणी (37)

मानिनी श्रीराधा को प्रसन्न करने के लिए श्रीकृष्ण करुणा भरे शब्दों में कहते हैं —
हे प्यारीजू! तुम्हारे मान (रूठने) को मनाने का मैं हर संभव प्रयास कर रहा हूँ, किंतु मैं पूर्णतः विवश हो चुका हूँ। तुम्हारी राजधानी वृन्दावन में वास करते हुए हर क्षण कोई न कोई नई युक्ति गढ़ता हूँ, परंतु वह भी निष्फल ही सिद्ध हो रही है। [1]

हे करुणामयी, गुणों की भंडार श्रीराधा! अब मैं कौन सी नवीन केली-लीला करूँ जिससे तुम्हारे अधरों पर प्रसन्नता की मधुर मुस्कान लौट आए? श्रीरामराय कहते हैं — अंततः श्रीकृष्ण श्रीराधा के चरणों में अपने सिर को रखते हैं, एवं अत्यंत दीन होकर करुणापूर्वक विनती करते हैं। [2]