न राधा न राधाप्रियो नापिवृन्दा-वनं नैववृन्दानि तत् प्रेमभाजाम्
सदा यस्य ह्रदगोचरे वाऽथ वाचां प्रचारे कथं तस्य रसश्रीः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.60)
जिसके हृदय में नित्य श्रीराधा, श्री कृष्ण, श्रीवृन्दावन तथा उनके प्रेमी रसिक-भक्त (सहचरी) गोचर नहीं होते हैं और न ही वाणी द्वारा कोई प्रचार होता है, वे इस अति अद्भुत रसश्री (वृन्दावन रस) का आस्वादन कैसे कर सकते हैं?
सदा यस्य ह्रदगोचरे वाऽथ वाचां प्रचारे कथं तस्य रसश्रीः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.60)
जिसके हृदय में नित्य श्रीराधा, श्री कृष्ण, श्रीवृन्दावन तथा उनके प्रेमी रसिक-भक्त (सहचरी) गोचर नहीं होते हैं और न ही वाणी द्वारा कोई प्रचार होता है, वे इस अति अद्भुत रसश्री (वृन्दावन रस) का आस्वादन कैसे कर सकते हैं?

