रास रच्यौ वृंदावन बनवारी।
बंसीवट कुंजन जमुना-तट, मनमोहन पिय रसिक बिहारी॥ [1]
निरत करत मन हरत सखिन कौ, उपजत रंग-तरंग अति भारी।
'पुरुषोत्तम' प्रभु की छबि निरखत, ब्रज-जन बार-बार बलिहारी ॥ [2]
- श्री पुरुषोत्तम जी
वृंदावन में रसिक-बिहारी श्रीकृष्ण ने यमुना तट के वंशीवट कुंजों में रास रचा है ।[1]
वे नृत्य करते हुए सखियों का मन हर रहे हैं और प्रेम के रंगों में सब को सराबोर कर रहे हैं। श्री पुरुषोत्तम जी कहते हैं — प्रभु श्रीकृष्ण की इस छवि को देखकर ब्रजवासी बार-बार बलिहारी जा रहे हैं। [2]
बंसीवट कुंजन जमुना-तट, मनमोहन पिय रसिक बिहारी॥ [1]
निरत करत मन हरत सखिन कौ, उपजत रंग-तरंग अति भारी।
'पुरुषोत्तम' प्रभु की छबि निरखत, ब्रज-जन बार-बार बलिहारी ॥ [2]
- श्री पुरुषोत्तम जी
वृंदावन में रसिक-बिहारी श्रीकृष्ण ने यमुना तट के वंशीवट कुंजों में रास रचा है ।[1]
वे नृत्य करते हुए सखियों का मन हर रहे हैं और प्रेम के रंगों में सब को सराबोर कर रहे हैं। श्री पुरुषोत्तम जी कहते हैं — प्रभु श्रीकृष्ण की इस छवि को देखकर ब्रजवासी बार-बार बलिहारी जा रहे हैं। [2]

