मोतिन के बोरे नहीं हंसन की नहि पांत - श्री बिहारिन देव, रसोपासना तिलक

मोतिन के बोरे नहीं हंसन की नहि पांत - श्री बिहारिन देव, रसोपासना तिलक

मोतिन के बोरे नहीं, हंसन की नहि पांत ।
शेरन के नहि रेवड़े, रसिकन की न जमात॥

- श्री बिहारिन देव, रसोपासना तिलक

हीरे बोरे भरकर नहीं मिलते, न ही हंस पंक्तियों में चलते हैं । शेरों की भी भेड़ों-सी भीड़ नहीं होती, वैसे ही वास्तविक रसिकों की कोई जमात नहीं होती —वे अत्यंत दुर्लभ एवं छिपे हुए होते हैं ।