लडैती आनंद निधि सुखरासी।
महा प्रेम भरी सहज छबीली, सदा ही प्रीतम पासी॥ [1]
अद्भुत रूप रसीली भामिनि, बँधे मधुर मृदु हासी ।
श्रीललितकिसोरी रसिक सिरोमनि, विलसत केलि विलासी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (2)
नित्य विहारिणी श्रीराधा आनंद की निधि और सुख का अगाध सागर हैं। वह महाप्रेम से भरी हुई, सहज रूप से छबीली एवं सदा अपने प्रियतम कुंजबिहारी के निकट रहती हैं। [1]
उनका रूप अद्भुत और रसपूर्ण है, उनकी मधुर मुस्कान अत्यंत मनमोहक है। श्रीललितकिशोरी कहती हैं — वे रसिकों की शिरोमणि हैं, जो प्रेम-केलि में मग्न होकर नित्य प्रेम-विहार में संलग्न रहती हैं। [2]
महा प्रेम भरी सहज छबीली, सदा ही प्रीतम पासी॥ [1]
अद्भुत रूप रसीली भामिनि, बँधे मधुर मृदु हासी ।
श्रीललितकिसोरी रसिक सिरोमनि, विलसत केलि विलासी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (2)
नित्य विहारिणी श्रीराधा आनंद की निधि और सुख का अगाध सागर हैं। वह महाप्रेम से भरी हुई, सहज रूप से छबीली एवं सदा अपने प्रियतम कुंजबिहारी के निकट रहती हैं। [1]
उनका रूप अद्भुत और रसपूर्ण है, उनकी मधुर मुस्कान अत्यंत मनमोहक है। श्रीललितकिशोरी कहती हैं — वे रसिकों की शिरोमणि हैं, जो प्रेम-केलि में मग्न होकर नित्य प्रेम-विहार में संलग्न रहती हैं। [2]

