यस्याः स्फूर्जत्पदनखमणि ज्योति - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (136)

यस्याः स्फूर्जत्पदनखमणि ज्योति - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (136)

यस्याः स्फूर्जत्पदनखमणि ज्योतिरेकच्छटायाः सान्द्र प्रेमामृतरस महासिन्धु कोटिविलासः ।
सा चेद्राधा रचयति कृपा दृष्टिपातं कदाचिन्, मुक्तिस्तुच्छो भवति वहुशः प्राकृता प्राकृतश्रीः ॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (136)

जिनकी प्रकाशमान् पद-नख-मणि-ज्योति की एक छटा का विलास सघन प्रेमामृत-रस के कोटि-कोटि सिन्धुओं के समान है। वे श्रीराधा यदि कदाचित् मुझ पर कृपा-दृष्टि-पात कर दें तो अनेक प्राकृत-अप्राकृत शोभायें और मुक्ति भी मेरे लिये तुच्छ हो जायँ ।