(राग विभास · त्रिताल)
श्यामा, सूझत नहीं कछु मोहे।
तुम जानत सब मेरे मन कीं, कहा जनाऊँ तोहे॥ [1]
तेरी शरण लई अब श्यामा, तुम बिन मेरा कोहै।
श्रीगोपालहित हरि लाड़ली, पल-पल तोहे जोहे॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (17)
हे श्यामाजू! मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा। तुम तो मेरे मन की समस्त बातों को जानती हो, फिर मैं तुम्हें क्या बताऊँ? [1]
अनंत जन्मों में भटकने के बाद अब मैंने तुम्हारी शरण ग्रहण की है, हे श्यामा जू! तुम्हारे बिना मेरा कोई नहीं। श्री हित गोपाल दास कहते हैं — हे हरि की लाड़ली, श्री राधा! मेरा हृदय हर क्षण तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहता है । [2]
श्यामा, सूझत नहीं कछु मोहे।
तुम जानत सब मेरे मन कीं, कहा जनाऊँ तोहे॥ [1]
तेरी शरण लई अब श्यामा, तुम बिन मेरा कोहै।
श्रीगोपालहित हरि लाड़ली, पल-पल तोहे जोहे॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (17)
हे श्यामाजू! मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा। तुम तो मेरे मन की समस्त बातों को जानती हो, फिर मैं तुम्हें क्या बताऊँ? [1]
अनंत जन्मों में भटकने के बाद अब मैंने तुम्हारी शरण ग्रहण की है, हे श्यामा जू! तुम्हारे बिना मेरा कोई नहीं। श्री हित गोपाल दास कहते हैं — हे हरि की लाड़ली, श्री राधा! मेरा हृदय हर क्षण तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहता है । [2]

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