श्रीवृन्दावन सघन सरस-सुख - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (4)

श्रीवृन्दावन सघन सरस-सुख - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (4)

श्रीवृन्दावन सघन सरस-सुख, नित छवि छाजत।
नन्दनवन से कोटि-कोटि, जिहि देखत लाजत॥

- श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (4)

दिव्य श्रीवृन्दावन धाम सघन और सरस रस की खानी है, जिसकी छटा चारों ओर छा रही है। इन्द्र के नन्दनवन जैसे कोटि-कोटि वन श्रीवृन्दावन को निहारकर लज्जित हो रहे हैं, अर्थात् वृन्दावन की शोभा उससे अनंत गुना अधिक श्रेष्ठ है।