जाके पद नेति नेति बंदत सुरेस सेस - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (60)

जाके पद नेति नेति बंदत सुरेस सेस - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (60)

(कवित्त)
जाके पद नेति नेति बंदत सुरेस सेस,
तेरे पद सीस नाय ठाड़े कर जोरी री। [1]
जेतौ नट नागर तू नागरी छबीली बाल,
कहा प्रतिपाल भई ऐसी मत भोरी री ॥ [2]
'लाल बलबीर' मिल दोऊ रस रंग कीजै,
दीजै सुख नैनन कौं मानि बिनै मोरी री। [3]
रही रैन थोरी अब सैन करौ गोरी,
कुञ्ज प्रीतम के संग मिलि कीरति किसोरी री ॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (60)

जिनके चरणों की स्तुति इन्द्र और शेष भी “नेति-नेति” कहकर करते हैं, वे परमब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण तुम्हारे चरणों में सिर नवाकर, हाथ जोड़कर खड़े हैं। [1]

यदि वे समस्त नटों में श्रेष्ठ नटनागर हैं, तो आप उनसे भी श्रेष्ठ परम नागरी छबीली बाला हैं — तो फिर बताओ, हे प्रतिपाल! यह कैसी भोली-सी संकोची मति हो गई है? [2]

श्रीलाल बलबीर जी विनती करते हैं — हे राधे! कृपा कर अब मान को त्यागकर अपने प्रियतम संग प्रेम-भरी केली करो और हम सहचरियों के नेत्रों को वह अनुपम सुख दो। [3]

हे गौरवर्ण कीर्ति-कुमारी श्रीराधे जू! रात्रि अब थोड़ी ही शेष है, समय आ गया है — अब कुञ्ज में प्रीतम के संग शयन की तैयारी करो। [4]