किं करिष्यन्ति नो वेदा - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (102)

किं करिष्यन्ति नो वेदा - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (102)

किं करिष्यन्ति नो वेदा किंवा देवा सहेश्वराः।
कुशला कुशलंवापि श्रीराधा भजतो ममः ॥

- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (102)

श्री राधा के अनन्य भजन में न मुझे वेद–शास्त्र की आज्ञा की आवश्यकता है और न ही किसी अन्य देवता या ईश्वर को प्रसन्न करने अथवा उनसे भयभीत होने की आवश्यकता है। चाहे वे मेरे लिए शुभ हों या अशुभ — मुझे इसकी कोई परवाह नहीं । मुझे तो केवल स्वामिनीजी की चरण–सेवा चाहिए, जो देवताओं की कृपा या वेद–विधान से नहीं, केवल श्री राधा महारानी की कृपा से ही प्राप्त होती है।